शैलेंद्र की तीसरी कसम - एक बेहतरीन फ़िल्म
शैलेंद्र ने तीसरी कसम का निर्माण करके साहित्यक कृतियों पर फ़िल्म बनाने की परंपरा को जीवंत कर दिया, फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी मारे गए गुलफ़ाम पर फ़िल्म बनी तीसरी कसम ।।।
1960 में शैलेंद्र ने इमेज मेकर्स प्रोडक्शन की स्थापना इस लिये की थी की जनता में साहित्यक कृतियों पर बनी फिल्मों के लिए रुझान जाग्रत हो ।।
तीसरी कसम की कहानी के लिए रेणु जी ने केवल 5000 रूपये मांगे थे किन्तु शैलेंद्र जी ने 10 हज़ार देने का प्रस्ताव रखा ।। ये एक कवि का एक लेखक के प्रति सच्चा भाव था .... जबकि फ़िल्म जगत में लेखकों का शोषण आम बात है ।।
तीसरी कसम का आरंभिक बजट 3 लाख रूपये का था जो बढ़ते बढ़ते 23 लाख पर जा पंहुचा ।
तीसरी कसम के लिए पहले नूतन को चुना गया था लेकिन स्वास्थ ख़राब होने के कारण वहीदा रहमान को हीरा बाई के रोल के लिए साइन किया गया ।
फ़िल्म वितरक कहानी के अंत को बदलने के लिए शैलेंद्र पर दवाब डाल रहे थे जो की शैलेंद्र जी को मंज़ूर नहीं था .... 14 जनवरी 1961 को फ़िल्म का मुहूर्त पूर्णिया बिहार में हुआ और लगभग 6 साल बाद सितम्बर 1966 में फ़िल्म रिलीज़ हुई ।
फ़िल्म समीक्षकों ने तीसरी कसम को एक बेहतरीन फ़िल्म माना ...
तीसरी कसम फिल्म स्क्रीन पर लिखी गयी अद्भुत, मर्म स्पर्शी कविता है ...दिल को छू लेने वाली कहानी, नवेन्दु घोष के मार्मिक संवाद, राज कपूर और वहीदा रहमान का बेजोड़ अभिनय, शंकर जयकिशन का कर्ण प्रिय संगीत, शब्द शिल्पी शैलेंद्र और हसरत के गीत और सुब्रत राय का छायांकन और वासु के अद्भुत निर्देशन के बाद भी फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर असफ़ल रही ....फ़िल्म की आरंभिक असफ़लता से शैलेंद्र जी को गहरा सदमा लगा और 14 दिसम्बर 1966 को ये अनमोल सितारा डूब गया ।
1966 का सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरुस्कार तीसरी कसम को मिला, बंगाल जर्नलिस्ट एसोसिएशन ने भी तीसरी कसम को सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का पुरुस्कार दिया
पर इस मान सम्मान को देखने के लिए अब शैलेंद्र इस दुनिया में नहीं थे ।
उन्होंने फ़िल्म की कहानी के साथ अन्याय नही होने दिया ।
रेणु जी के अनुसार शैलेंद्र जी को शराब या क़र्ज़ ने नही मारा बल्कि वह एक धर्म युद्ध में शहीद हो गए
सर्वश्रेष्ठ गीत के लिए उन्हें तीन बार फ़िल्म फ़ेयर का पुरूस्कार दिया गया
ये मेरा दीवानापन है (यहूदी)
सब कुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी (अनाड़ी)
मैं गाउँ तुम सो जाओ (ब्रम्हमाचारी)
सब कुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी (अनाड़ी)
मैं गाउँ तुम सो जाओ (ब्रम्हमाचारी)
तू प्यार का सागर है सीमा का गीत, किसी की मुस्कुराहटों पर हो निसार, मैं नदिया फिर भी मैं प्यासी, साजन रे झूठ मत बोलो, बहुत दिया देने वाले ने तुझको, धरती कहे पुकार के, माटी से खेलते हो किसलिए, जैसे सदाबहार जीवन मूल्यों से परिपूर्ण गीत, रचकर शैलेंद्र ने जो मिसाल कायम की है वो एक मिसाल है, 2013 में भारत सरकार ने शैलेंद्र पर एक डाक टिकट भी जारी किया था ।
आपकी स्मृति में शैलेंद्र मेमोरियल ट्रस्ट, रुड़की द्ववारा शैलेंद्र सम्मान की स्थापना की गयी है ।
जो की द्विवर्षीय आधार पर फ़िल्म जगत के उस गीतकार को दिया जाता है जिसने ये परंपरा बरक़रार रखी हो
अब तक ये सम्मान गुलज़ार, कैफ़ी आज़मी, नीरज, योगेश, गुलशन बाबरा, प्रसून जोशी, संतोषानंद, निदा फ़ाज़ली को दिया गया है

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