माखनलाल चतुर्वेदी - RJSURABHISAXENA

माखनलाल चतुर्वेदी


बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में अनेक महापुरुषों ने राष्ट्रीय परिदृश्य पर अपने बहुआयामी व्यक्तित्व और कालजयी कृतित्व की छाप छोड़ी है। ऐसे महापुरुषों में दादा माखनलाल चतुर्वेदी का नाम बड़े आदरपूर्वक लिया जाता है। 

वे सुधी चिंतक, सुकवि और प्रखर पत्रकार होने के साथ-साथ स्वतंत्रता संग्राम के सेनापतियों में से एक थे  ४ अप्रैल 1889  को मध्य प्रदेश जन्में एक ख्यातिप्राप्त कवि लेखक और पत्रकार थे जिनकी रचनाएँ पूरे भारत में लोकप्रिय हुईं। सरल भाषा और ओजपूर्ण भावनाओं के वे अनूठे हिंदी रचनाकार थे।


एक रचना ये देखें :-


उड़ने दे घनश्याम गगन में|


बिन हरियाली के माली पर
बिना राग फैली लाली पर
बिना वृक्ष ऊगी डाली पर
फूली नहीं समाती तन में
उड़ने दे धनश्याम गगन में!

स्मृति-पंखें फैला-फैला कर
सुख-दुख के झोंके खा-खाकर
ले अवसर उड़ान अकुलाकर
हुई मस्त दिलदार लगन में
उड़ने दे धनश्याम गगन में!

चमक रहीं कलियाँ चुन लूँगी
कलानाथ अपना कर लूँगी
एक बार ’पी कहाँ’ कहूँगी
देखूँगी अपने नैनन में
उड़ने दे धनश्याम गगन में!

नाचूँ जरा सनेह नदी में
मिलूँ महासागर के जी में
पागलनी के पागलपन ले--
तुझे गूँथ दूँ कृष्णार्पण में
उड़ने दे धनश्याम गगन में!

और सच्चे अर्थों में संपूर्ण मानव थे। उनकी मुकम्मल पहचान 'एक भारतीय आत्मा' के रूप में है, जो सर्वथा सटीक भी है।


सरल भाषा और ओजपूर्ण भावनाओं के वे अनूठे हिंदी रचनाकार थे। तो वहीँ प्रकृति पर भी लिखा है 


चल पडी चुपचाप सन-सन-सन हुआ,

डालियों को यों चिताने-सी लगी
आँख की कलियाँ, अरी, खोलो जरा,
हिल खपतियों को जगाने-सी लगी.। 

अप्रैल 1913 में खंडवा के हिन्दी सेवी कालूराम गंगराड़े ने मासिक पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया, जिसके संपादन का दायित्व माखनलालजी को सौंपा गया। सितंबर 1913 में उन्होंने अध्यापक की नौकरी छोड़ दी और पूरी तरह पत्रकारिता, साहित्य और राष्ट्रीय आंदोलन के लिए समर्पित हो गए। 

वे सच्चे देशप्रमी थे और १९२१-२२ के असहयोग आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेते हुए जेल भी गए। आपकी कविताओं में देशप्रेम के साथ साथ प्रकृति और प्रेम का भी सुंदर चित्रण हुआ है।



चट जग जाता हूँ, चिराग को जलाता हूँ,
हो सजग तुम्हें मैं देख पाता हूँ कि पैठे हो;
पास नहीं आते, हो पुकार मचवाते,
तकसीर बतलाओ क्यों यों बदन उमैठे हो?
दरश दिवाना, जिसे नाम को ही बाना,
उसे शरण विलोकते भी देव-देव ऐंठे हो;
सींखचों में घूमता हूँ, चरणों को चूमता हूँ,
सोचता हूँ, मेरे इष्टदेव पास बैठे हो।

स्वतंत्रता संग्राम में उनकी तेजस्वी-ओजस्वी भागीदारी के अलावा माखनलालजी को जानने के तीन माध्यम हैं। (महात्मा गाँधी द्वारा आहूत सन्‌ 1920 के 'असहयोग आंदोलन' में महाकोशल अंचल से पहली गिरफ्तारी देने वाले माखनलालजी ही थे। 

सन्‌ 1930 के 'सविनय अवज्ञा' आंदोलन में भी उन्हें गिरफ्तारी देने का प्रथम सम्मान मिला।) 


उनके महान कृतित्व के तीन आयाम हैं : एक, पत्रकारिता- 'प्रभा', 'कर्मवीर' और 'प्रताप' का संपादन। दो- माखनलालजी की कविताएँ, निबंध, नाटक और कहानी। तीन- माखनलालजी के अभिभाषण/ व्याख्यान। 


अप्रैल 1925 को जब खंडवा से माखनलाल चतुर्वेदी ने 'कर्मवीर' का पुनः प्रकाशन किया तब उनका आह्वान था, 'आइए, गरीब और अमीर, किसान और मजदूर, उच्च और नीच, जित और पराजित के भेदों को ठुकराइए। 
प्रदेश में राष्ट्रीय ज्वाला जगाइए और देश तथा संसार के सामने अपनी शक्तियों को ऐसा प्रमाणित कीजिए, जिसका आने वाली संतानें स्वतंत्र भारत के रूप में गर्व करें।' 

इसी अग्रलेख के अंतिम वाक्य से उनके निरभिमानी व्यक्तित्व व सोच का परिचय मिलता है, और कदाचित यही उनके संपादन की सबसे बड़ी शक्ति भी थी, 'प्रभु करे सेवा के इस पथ में मुझे अपने दोषों का पता रहे और आडंबर, अभिमान और आकर्षण मुझे पथ से भटका न पाए।' 

किसानों की दुर्दशा, उनका संगठित शक्ति के रूप में खड़े न होना और इस वजह से उनके कष्टों और समस्याओं की अनदेखी करना माखनलालजी को बेचैन करता था। 



माखनलाल चतुर्वेदी के साहित्यिक अवदान का एक परिचय उर्दू के नामवर साहित्यकार रघुपति सहाय 'फिराक गोरखपुरी' की इस टिप्पणी से मिलता है- 'उनके लेखों को पढ़ते समय ऐसा मालूम होता था कि आदिशक्ति शब्दों के रूप में अवतरित हो रही है या गंगा स्वर्ग से उतर रही है। यह शैली हिन्दी में ही नहीं, भारत की दूसरी भाषाओं में भी विरले ही लोगों को नसीब हुई। मुझ जैसे हजारों लोगों ने अपनी भाषा और लिखने की कला माखनलालजी से ही सीखी।' 

माखनलाल चतुर्वेदी ने ही मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन में यह प्रस्ताव पारित कराया था कि 'साहित्यकार स्वराज्य प्राप्त करने के ध्येय से लिखें।' 

नागपुर विश्वविद्यालय में भाषण करते हुए (2-12-1934) माखनलालजी ने साहित्य के संदर्भ में अपनी अवधारणा स्पष्ट की थी- 'लोग साहित्य को जीवन से भिन्न मानते हैं, वे कहते हैं साहित्य अपने ही लिए हो। साहित्य का यह धंधा नहीं कि हमेशा मधुर ध्वनि ही निकाला करे... जीवन को हम एक रामायण मान लें। रामायण जीवन के प्रारंभ का मनोरम बालकांड ही नहीं किंतु करुण रस में ओतप्रोत अरण्यकांड भी है और धधकती हुई युद्धाग्नि से प्रज्वलित लंकाकांड भी है।


1943 में उस समय का हिन्दी साहित्य का सबसे बड़ा 'देव पुरस्कार' माखनलालजी को 'हिम किरीटिनी' पर दिया गया था। 

1954 में साहित्य अकादमी पुरस्कारों की स्थापना होने पर हिन्दी साहित्य के लिए प्रथम पुरस्कार दादा को 'हिमतरंगिनी' के लिए प्रदान किया गया। 


'पुष्प की अभिलाषा' और 'अमर राष्ट्र' जैसी ओजस्वी रचनाओं के रचयिता इस महाकवि के कृतित्व को सागर विश्वविद्यालय ने 1959 में डी.लिट्. की मानद उपाधि से विभूषित किया। 


1963 में भारत सरकार ने 'पद्मभूषण' से अलंकृत किया। 10 सितंबर 1967 को राष्ट्रभाषा हिन्दी पर आघात करने वाले राजभाषा संविधान संशोधन विधेयक के विरोध में माखनलालजी ने यह अलंकरण लौटा दिया।


16-17 जनवरी 1965 को मध्यप्रदेश शासन की ओर से खंडवा में 'एक भारतीय आत्मा' माखनलाल चतुर्वेदी के नागरिक सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। तत्कालीन राज्यपाल श्री हरि विनायक पाटसकर और मुख्यमंत्री पं. द्वारकाप्रसाद मिश्र तथा हिन्दी के अग्रगण्य साहित्यकार-पत्रकार इस गरिमामय समारोह में उपस्थित थे। तब मिश्रजी के उद्गार थे- 'सत्ता, साहित्य के चरणों में नत है।' सचमुच माखनलालजी के बहुआयामी व्यक्तित्व और कालजयी कृतित्व की महत्ता सत्ता की तुलना में बहुत ऊँचे शिखर पर प्रतिष्ठित है और सदैव रहेगी।



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